Monday, June 28, 2010

क्या उत्तर प्रदेश के ये अध्यापक सही हैं ?

सन्नी एक आवारा किस्म का लड़का है। बाप एक व्यवसायी है। सन्नी अपने बाप के साथ व्यवसाय में हाथ तो बंटाता ही नहीं साथ ही पढ़ाई भी नहीं करता। बस जैसे अधिकतर लड़के सेटिंग से पास होते हैं वैसे ही उसने किसी टटपुंजिया कॉलेज से हाईस्कूल और इंटरमीडियट पास की और वो भी अच्छे मार्क्स से। लगभग दोनों में ही उसने किसी तरह से 70 प्रतिशत के आसपास नंबर ले लिए। उसके बाद ग्रेजुएशन की। उसमें भी उसने कोई खास पढ़ाई नहीं की लेकिन मास्टरों से सेटिंग का फंडा यहां भी काम आया। और लगभग 65 प्रतिशत के आसपास मार्क्स लाने में कामयाब हो गया। जब वह कुछ नहीं पढ़ता था तो उसके साथ के लड़के सोचते थे कि यह कभी सफल नहीं हो सकता। सिर्फ सेटिंग से अच्छे नंबर लाने से कुछ नहीं होता। नौकरी के लिए पढ़ाई बहुत जरूरी है। लेकिन उत्तर प्रदेश में जब से यह बीटीसी में मेरिट वाला सिस्टम चला तब से सन्नी जैसे लड़कों की लॉटरी निकल गई। किसी को क्या मालूम की वह इतने नंबर कैसे लाया। बस उसकी मेरिट हाई है तो उसका नंबर बीटीसी में आ गया और वो आज एक बीटीसी टीचर है। नौकरी लगते ही लड़की वाले टूटकर पड़े कि कहीं लड़का हाथ से ना निकल जाए। यानि सेटिंग के फंडे ने लाइफ सेट कर दी। दूसरी तरफ अशोक है जो शुरू से ही सरकारी स्कूल में पढ़ा। मेहनत के साथ नंबर लाया लेकिन उसके नंबर सेटिंग वाले नंबरों कम ही रहे। गरीब का बच्चा था, और सेटिंग नहीं कर सकता था क्योंकि सेटिंग के लिए पैसों की जरूरत पड़ती है और वैसे भी वो शुरू से ही मेहनती लड़का था और सेटिंग से ज्यादा मेहनत की पढ़ाई पर विश्वास करता था। दिन रात मेहनत से पढ़ता था लेकिन मेहनत की पढ़ाई करके सेटिंग की पढ़ाई से पीछे ही रहा। जिसका खामियाजा उसे आज झेलना पड़ रहा है। उसका बीटीसी में चयन नहीं हुआ और अच्छी तरह पढ़ाई करने के बाद और ज्यादा योग्य होने के बाद भी आज वो आज रेलवे फाटक के पास खड़ा होकर नींबू बेचता है। अगर उसके पास भी पैसे होते और वो भी सन्नी की तरह सेटिंग सेट करता तो शायद उसका नंबर भी बीटीसी जैसी किसी नौकरी में आ जाता।

कहानी का सारांश ये है कि उत्तर प्रदेश में जिस तरह पहले बीएड किए हुए सभी बच्चों को मेरिट के आधार पर सीधे ही विशिष्ट बीटीसी में चयनित कर लिया गया और फिर अब ग्रेजुएट बच्चों को सीधे बीटीसी में चयन किया जा रहा है क्या वो किसी हद तक सही है। अशोक जैसे ना जाने कितने ही लड़के और लड़कियां योग्यता होने के बावजूद दर दर की ठोकरें खा रहे हैं और सन्नी जैसे लड़के सिस्टम की इस घटिया नीति के चलते आज मास्टर जी बने बैठे हैं। जिन्हें ये तक नहीं पता कि देश का राष्ट्रपति कौन है। सीधी सी बात है कि जो आज तक खुद ही स्कूल नहीं गया वो छोटे छोटे बच्चों को क्या पढ़ाएगा। इस तरह से तो उत्तर प्रदेश सरकार सिर्फ पढ़े लिखे अनपढ़ मास्टरों की एक फौज तैयार कर रही है। इस सिस्टम से उन योग्य बच्चों की तो जिंदगी खराब हो ही रही है जिनका नंबर इस मेरिट के वजह से बीटीसी में नहीं आ पाया, साथ ही उन छोटे छोटे बच्चों का भी भविष्य भी अंधेरे में जा रहा है जो ऐसे मास्टरों से शिक्षा ग्रहण करेंगे। यही वजह है कि भारत सरकार जिस तरह देश में जीतोड़ करने सर्वशिक्षा अभियान चला रही है उसे उस तरह के सकारात्मक परिणाम नहीं मिल रहे हैं। इस मेरिट सिस्टम ने उन लोगों को भी मास्टर बना दिया जिनका मास्टरी में रूझान नहीं था लेकिन सरकारी नौकरी के लालच में वो इसे छोड़ नहीं पाए। किसे अच्छा नहीं लगता है कि दिन में सिर्फ पांच छह घंटे कुर्सी तोड़ कर महिने में सौलह सत्तरह हजार रूपए सीधे कर लें। यही कारण है कि वे बच्चों को दिल से नहीं पढ़ा रहे हैं जिसके कारण इस योजना पर फूंका जा रहा करोड़ो अरबों रूपया पानी में जा रहा है।

क्या इसकी जगह इसमें परीक्षा का प्रावधान नहीं होना चाहिए था। अगर यूपी सरकार बीटीसी अध्यापकों की नियुक्ति के लिए परीक्षा वाली नियुक्ति प्रक्रिया अपनाती तो इसके बहुत फायदे होते। एक तो वही लोग इस परीक्षा में पास होकर अध्यापक बनते जो वास्तव में ही अध्यापक बनने की योग्यता रखते हैं और दूसरे वे लोग इस क्षेत्र में नहीं आते जो इस प्रोफेशन में नहीं आना चाहते थे। अगर यह प्रक्रिया बीटीसी के चयन में अपनाई जाती तो शायद तब जाकर इस योजना का पूरा पूरा फायदा मिल पाता। और साथ ही उन छोटे छोटे बच्चों को भी कुछ ना कुछ सीखने को मिल जाता जो लगभग सवा लाख अध्यापक नियुक्त होने के बाद भी शिक्षा के लिए तरस रहे हैं। सरकार को अपनी इस नीति पर एक बार विचार जरूर करना चाहिए।

Saturday, May 29, 2010

एक और नक्सली वारदात

प.बंगाल के झाड़ग्राम में हुई रेल दुर्घटना में साफ है कि यह नक्सलियों की ही करतूत है लेकिन जिस तरह से सत्ताधारी सरकार के तीन बड़े मंत्रिय़ों ने इस घटना पर अलग अलग प्रतिक्रियाएं दी हैं वो सोचने लायक स्थितियां पैदा करती हैं। ममता का कहना है कि यह नक्सलियों द्वारा कराए गए विस्फोट का ही परिणाम था कि इसमें 150 से ज्यादा जिंदगियां गई। ऐसा कहकर शायद वह अपनी जिम्मेदारी से कन्नी काट रही हैं, वो जिम्मेदारी जिसके तहत रेलवे की सुरक्षा उनके जिम्मे आती है। जबकि गृह मंत्री पी चिदंबरम का कहना था कि यह करतूत नक्सलियों की हो सकती है लेकिन वारदात की जगह से किसी विस्फोट के निशान नहीं मिले हैं। उनका यह बयान उन्हें देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी से बचाता है। क्योंकि अगर वह यह कह देते हैं कि किसी विस्फोट के निशान मिले हैं तो इस घटना का सारा ठीकरा गृह मंत्री के ऊपर आ फूटता है। यानि दोनों ने अपने बयान देकर अपने ऊपर से सारी दिक्कतों को साफ कर दिया। वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी का इस घटना के बारे में बयान भी काफी राजनीतिक है। उन्होंने अपने बयान में यह कहकर कि यह तोड़फोड़ है या विस्फोट, कहना मुश्किल है... अपने सारे मतलब पूरे कर दिए हैं। इससे उन्होंने ममता को भी नहीं बख्शा और पी. चिदंबरम का भी बचाव कर लिया। लेकिन इस घटना के बाद सवाल ये उठता है कि चूक चाहे गृहमंत्रालय की हो या फिर रेल मंत्रालय की, इस चूक का खामियाजा तो हर बार बेचारी जनता को उठाना पड़ता है। हर बार नक्सली किसी घटना को अंजाम देते हैं और हर बार मंत्रालय आपस में बयानबाजी करके, दो सांत्वना के शब्द कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। आखिर क्यों, कभी नक्सलियों के खिलाफ कोई कड़ा कदम नहीं उठाया जाता। क्या हमारी बेचारी सरकार अभी किसी वर्ल्डट्रेड सेंटर जैसे हमले के इंतजार में है, क्या उसने जनमानस की भरपाई का कोई मानक बनाया हुआ है कि जब तक उस मानक जितने लोग नहीं मरेंगे तब तक वो कोई कार्रवाई नहीं करेगी। या फिर सरकार इस इंतजार में नक्सली जब तक देश की सत्ता को पलटने लायक नहीं हो जाते तब तक इस बारे में विचार करना फिजूल है। खैर, सरकार की सोच चाहे जो भी हो लेकिन हमारी सरकार को एक बात जरूर सोचनी चाहिए कि हर विस्फोट में मरने वाला व्यक्ति किसी का भाई- बहन, पति- पत्नी या बेटा-बेटी होता है। बहुत दुख होता है अपनों से सदा के लिए बिछुड़ने का। ये बात नक्सलियों से कहने का तो कोई फायदा नहीं। उनसे कहना तो भैंस के आगे बीन बजाना जैसा हो गया है। उनके भीतर से तो मानवीयता खत्म हो चुकी है इसलिए अब वे आम नागरिक औऱ सेना में कोई अंतर नहीं समझ रहे हैं। पहले जहां वे सेना के विरुद्ध अपनी कार्रवाई किया करते थे अब उनके निशाने पर आम नागरिक भी आ चुके हैं। इसलिए उन्हें अब मानवता याद दिलाने से कोई फायदा नहीं है, लेकिन सरकार तो इस बारे में कुछ ठोस कदम उठा सकती है फिर क्यों वह चुप हैं, क्यों वह बार बार सिर्फ बयानबाजी करके बच जाती है। ये समय है जब सरकार को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए आम नागरिकों की सुरक्षा करना चाहिए। अगर अब भी सरकार कुछ नहीं कर पाई तो वह वक्त दूर नहीं जब किसी भी आम आदमी को कम्युनिज्म के नाम पर शूली पर चढ़ा दिया जाया करेगा....सोचो सत्ता के रखवालों....सोचो

Monday, January 25, 2010

मंहगाई का आलम

चीनी का स्बाद पहले ही कड़वा हो चुका है और अब लगता है कि कृषि और खाद्यमंत्री शरद पवार दूध का रंग भी हलका करने का मन बना लिया है। केन्द्रीयमंत्री के हालिया ब्यान से ऐसा ही लगता है कि वे गरीब के मुहं से दाल औरचीनी तो पहले छीन चुके हैं अब इस कड़कड़ाती सर्दी को भी बिना चाय केगुजारने का इंतजाम करने में लगे हैं। केन्द्रीय मंत्री जी का कहना है कि उत्तर प्रदेश के दूध उत्पादकों काबुरा हाल है। राज्य सरकार उन्हें प्रोत्साहन नहीं दे रही हैं इसलिएउन्हें दूध के दाम बढ़ा देने चाहिए। जबकि आंकड़े कहते हैं कि दूध काउत्पादन साल दर साल बढ़ रहा है। पंजाब में पिछले वर्ष की अपेक्षा 3 % दूधका उत्पादन बढ़ा है। आगरा में पिछले वर्ष के बराबर ही इस वर्ष उत्पादनरहा। बावजूद इसके पवार जी का कहना है कि दूध उत्पादन घटा है। पवार जी कोज्ञात होना चाहिए कि दूध के दाम तो दूध उत्पादक बिना उनके सुझाव के हीबढ़ा देते हैं। हर साल दूध के दामों में वृद्धि देखी जा सकती है। इस सालदूध 25 से 30 रूपए लीटर बिक रहा है जो कि पिछले वर्ष 20 से 25 रूपए लीटरथा और उससे भी पिछले वर्ष 2007 में यह आंकड़ा 20 रूपए लीटर ही था। अतःजब हर साल दूध के दामों में लगभग 5 रूपए लीटर की बढ़ोतरी हो जाती है तोफिर क्यों खाद्य मंत्री जी और मूल्य बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। मंहगाईका पहले ही यह आलम हो चुका है कि वह आम आदमी तो क्या खास आदमी की भी कमरतोड़ चुकी है। दाल 100 रूपए किलो बिक रही है, चीनी 50 रूपए किलो हो चुकीहै। अब अगर दूध भी महंगा हो गया तो अब आम जनता तो सिर्फ काली और फीकी चायपीकर ही गुजारा करेगी। रहम किजिए खाद्य मंत्री जी, आपको शायद याद नहीं किदेश की 80% जनसंख्या सिर्फ 20 रूपए रोज पर ही गुजारा कर रही है।

Wednesday, January 13, 2010

आखिर क्यों ना बढ़े महंगाई।

आज के दौर में महंगाई का हाल किसी से छिपा नहीं है। महंगाई ने गरीब तो क्या अच्छे अच्छे की कमर तोड़ कर रख दी है। देश के तमाम आर्थिक विश्लेषक और नीति निर्धारक सिर्फ इसी बीत पर ज्यादा सोच विचार कर रहे हैं कि आखिर महंगाई को कैसे नियंत्रण में लिया जाए। लेकिन अगर सरकार ही ना चाहे तो महंगाई पर कैसे काबू पाया जा सकता है। पिछले दिनों के गन्ना विवाद ने तो जन जन को बता दिया था कि किस प्रकार चीनी 40 रुपए किलो तक बिक रही है और किसानों को गन्ने के दाम कोड़ियों के भाव मिल रहे हैं। यही कारण है कि अधिकतर किसानों ने गन्ने की फसल ही उगाना छोड़ दी और चीनी के लिए उपयुक्त गन्ना लगातार कम होता जा रहा है। कुछ ऐसा ही हाल बाजार में दाल का भी है। दाल के मामले में भी सरकार समर्थन मूल्य के नाम पर सिर्फ कुछ छुट्टे पैसे ही थमा रही है। जिस कारण किसानों ने दाल जैसे आवश्यक खाद्यान्न के उत्पादन से भी हाथ खींचने शुरु कर दिए हैं। दाल की सरकारी किमत है 23 रुपए किलो और दाल खुले बाजार में बिक रही है 90 रुपए किलो। मतलब साफ है कि दाल उगाने में सरकारी प्रोत्साहन का दिखावा भी कायदे से नहीं होता। दाल का समर्थन मूल्य उसके आयातित मूल्य(दाल का आयात मूल्य 56 रुपए प्रति किलो है) से भी कम है। दाल की खेती के लिए सुविधाओं की कमी, किसानों की उपेक्षा और सरकारी समर्थन का अभाव, इसके बाद आखिर कौन दाल उगाने की जहमत उठाएगा।

जानलेवा अपेक्षाएं।

मुंबई में एक ही दिन चार बच्चों के आत्महत्या और बुधवार को दिल्ली में एक छात्रा द्वारा आत्महत्या। ऐसा लगता है कि छात्र- छात्राओं द्बारा आत्महत्या का एक चलन चल पड़ा है। और इस चलन के पीछे सबसे बड़ी भूमिका है माता पिता की। माता पिता की अपेक्षाओं पर खरा ना उतर पाने के कारण ही बच्चे छोटी छोटी उम्र में मौत को गले लगा रहे हैं। उस उम्र में, जिसमें उन्हें मौत का सही सही मतलब भी नहीं पता है। 12 वर्ष का सुशांत पाटिल अच्छे नंबर नहीं ला पाया तो फांसी से झूल गया, 11 वर्ष की नेहा के माता पिता ने चाहा कि वह डांस छोड़कर स्कूल की पढ़ाई पर ध्यान दे तो उसने जहर खा लिया। आखिर ये माता पिता अपने बच्चों से इतनी अपेक्षाएं रखते ही क्यों हैं जो उनके लिए जानलेवा बन जाती है। जिनके पूरे ना होने से बच्चा इतनी ग्लानी महसूस करता है कि जिंदगी छोड़ने की ही मन बना लेता है। क्या कभी इन्होंने बच्चे से पूछा कि वह क्या बनना चाहते है, उसकी क्या आकांक्षाएं हैं। शायद नहीं। क्योंकि आज का मानव विकास की दौड़ में इतना अंधा हो चुका है कि उसकी भावनाएं मर चुकी हैं। वह अपने बच्चों पर सफलता और कामयाबी शब्द को सिर्फ चस्पा कर देना चाहता है बिना यह सोचे कि वह बच्चे को किस दिशा में ले जा सकता है। हालिया प्रदर्शित फिल्म थ्री इडियट्स भी इसी व्यवस्था पर चोट करने वाली फिल्म है। उसके भी एक किरदार को उसके माता पिता पैदा होते ही भविष्य तय कर देते हैं कि हमारा बेटा इंजीनियर बनेगा। आखिर क्या फायदा ऐसी सफलता का जिसमें हमारे बच्चे दम घोंट घोंट कर जिएं। इससे तो अच्छा है कि एक बार उनसे भी पूछ लिया जाए कि वे क्या बनना चाहते हैं।