Wednesday, January 13, 2010
आखिर क्यों ना बढ़े महंगाई।
आज के दौर में महंगाई का हाल किसी से छिपा नहीं है। महंगाई ने गरीब तो क्या अच्छे अच्छे की कमर तोड़ कर रख दी है। देश के तमाम आर्थिक विश्लेषक और नीति निर्धारक सिर्फ इसी बीत पर ज्यादा सोच विचार कर रहे हैं कि आखिर महंगाई को कैसे नियंत्रण में लिया जाए। लेकिन अगर सरकार ही ना चाहे तो महंगाई पर कैसे काबू पाया जा सकता है। पिछले दिनों के गन्ना विवाद ने तो जन जन को बता दिया था कि किस प्रकार चीनी 40 रुपए किलो तक बिक रही है और किसानों को गन्ने के दाम कोड़ियों के भाव मिल रहे हैं। यही कारण है कि अधिकतर किसानों ने गन्ने की फसल ही उगाना छोड़ दी और चीनी के लिए उपयुक्त गन्ना लगातार कम होता जा रहा है। कुछ ऐसा ही हाल बाजार में दाल का भी है। दाल के मामले में भी सरकार समर्थन मूल्य के नाम पर सिर्फ कुछ छुट्टे पैसे ही थमा रही है। जिस कारण किसानों ने दाल जैसे आवश्यक खाद्यान्न के उत्पादन से भी हाथ खींचने शुरु कर दिए हैं। दाल की सरकारी किमत है 23 रुपए किलो और दाल खुले बाजार में बिक रही है 90 रुपए किलो। मतलब साफ है कि दाल उगाने में सरकारी प्रोत्साहन का दिखावा भी कायदे से नहीं होता। दाल का समर्थन मूल्य उसके आयातित मूल्य(दाल का आयात मूल्य 56 रुपए प्रति किलो है) से भी कम है। दाल की खेती के लिए सुविधाओं की कमी, किसानों की उपेक्षा और सरकारी समर्थन का अभाव, इसके बाद आखिर कौन दाल उगाने की जहमत उठाएगा।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment