Saturday, May 29, 2010
एक और नक्सली वारदात
प.बंगाल के झाड़ग्राम में हुई रेल दुर्घटना में साफ है कि यह नक्सलियों की ही करतूत है लेकिन जिस तरह से सत्ताधारी सरकार के तीन बड़े मंत्रिय़ों ने इस घटना पर अलग अलग प्रतिक्रियाएं दी हैं वो सोचने लायक स्थितियां पैदा करती हैं। ममता का कहना है कि यह नक्सलियों द्वारा कराए गए विस्फोट का ही परिणाम था कि इसमें 150 से ज्यादा जिंदगियां गई। ऐसा कहकर शायद वह अपनी जिम्मेदारी से कन्नी काट रही हैं, वो जिम्मेदारी जिसके तहत रेलवे की सुरक्षा उनके जिम्मे आती है। जबकि गृह मंत्री पी चिदंबरम का कहना था कि यह करतूत नक्सलियों की हो सकती है लेकिन वारदात की जगह से किसी विस्फोट के निशान नहीं मिले हैं। उनका यह बयान उन्हें देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी से बचाता है। क्योंकि अगर वह यह कह देते हैं कि किसी विस्फोट के निशान मिले हैं तो इस घटना का सारा ठीकरा गृह मंत्री के ऊपर आ फूटता है। यानि दोनों ने अपने बयान देकर अपने ऊपर से सारी दिक्कतों को साफ कर दिया। वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी का इस घटना के बारे में बयान भी काफी राजनीतिक है। उन्होंने अपने बयान में यह कहकर कि यह तोड़फोड़ है या विस्फोट, कहना मुश्किल है... अपने सारे मतलब पूरे कर दिए हैं। इससे उन्होंने ममता को भी नहीं बख्शा और पी. चिदंबरम का भी बचाव कर लिया। लेकिन इस घटना के बाद सवाल ये उठता है कि चूक चाहे गृहमंत्रालय की हो या फिर रेल मंत्रालय की, इस चूक का खामियाजा तो हर बार बेचारी जनता को उठाना पड़ता है। हर बार नक्सली किसी घटना को अंजाम देते हैं और हर बार मंत्रालय आपस में बयानबाजी करके, दो सांत्वना के शब्द कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। आखिर क्यों, कभी नक्सलियों के खिलाफ कोई कड़ा कदम नहीं उठाया जाता। क्या हमारी बेचारी सरकार अभी किसी वर्ल्डट्रेड सेंटर जैसे हमले के इंतजार में है, क्या उसने जनमानस की भरपाई का कोई मानक बनाया हुआ है कि जब तक उस मानक जितने लोग नहीं मरेंगे तब तक वो कोई कार्रवाई नहीं करेगी। या फिर सरकार इस इंतजार में नक्सली जब तक देश की सत्ता को पलटने लायक नहीं हो जाते तब तक इस बारे में विचार करना फिजूल है। खैर, सरकार की सोच चाहे जो भी हो लेकिन हमारी सरकार को एक बात जरूर सोचनी चाहिए कि हर विस्फोट में मरने वाला व्यक्ति किसी का भाई- बहन, पति- पत्नी या बेटा-बेटी होता है। बहुत दुख होता है अपनों से सदा के लिए बिछुड़ने का। ये बात नक्सलियों से कहने का तो कोई फायदा नहीं। उनसे कहना तो भैंस के आगे बीन बजाना जैसा हो गया है। उनके भीतर से तो मानवीयता खत्म हो चुकी है इसलिए अब वे आम नागरिक औऱ सेना में कोई अंतर नहीं समझ रहे हैं। पहले जहां वे सेना के विरुद्ध अपनी कार्रवाई किया करते थे अब उनके निशाने पर आम नागरिक भी आ चुके हैं। इसलिए उन्हें अब मानवता याद दिलाने से कोई फायदा नहीं है, लेकिन सरकार तो इस बारे में कुछ ठोस कदम उठा सकती है फिर क्यों वह चुप हैं, क्यों वह बार बार सिर्फ बयानबाजी करके बच जाती है। ये समय है जब सरकार को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए आम नागरिकों की सुरक्षा करना चाहिए। अगर अब भी सरकार कुछ नहीं कर पाई तो वह वक्त दूर नहीं जब किसी भी आम आदमी को कम्युनिज्म के नाम पर शूली पर चढ़ा दिया जाया करेगा....सोचो सत्ता के रखवालों....सोचो
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जल्दी पूरी हो - शुभकामनाएं
ReplyDeleteपत्रकार जी, लगे रहिए, एक दिन तलाश जरूर पूरी होगी। ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है।
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