सन्नी एक आवारा किस्म का लड़का है। बाप एक व्यवसायी है। सन्नी अपने बाप के साथ व्यवसाय में हाथ तो बंटाता ही नहीं साथ ही पढ़ाई भी नहीं करता। बस जैसे अधिकतर लड़के सेटिंग से पास होते हैं वैसे ही उसने किसी टटपुंजिया कॉलेज से हाईस्कूल और इंटरमीडियट पास की और वो भी अच्छे मार्क्स से। लगभग दोनों में ही उसने किसी तरह से 70 प्रतिशत के आसपास नंबर ले लिए। उसके बाद ग्रेजुएशन की। उसमें भी उसने कोई खास पढ़ाई नहीं की लेकिन मास्टरों से सेटिंग का फंडा यहां भी काम आया। और लगभग 65 प्रतिशत के आसपास मार्क्स लाने में कामयाब हो गया। जब वह कुछ नहीं पढ़ता था तो उसके साथ के लड़के सोचते थे कि यह कभी सफल नहीं हो सकता। सिर्फ सेटिंग से अच्छे नंबर लाने से कुछ नहीं होता। नौकरी के लिए पढ़ाई बहुत जरूरी है। लेकिन उत्तर प्रदेश में जब से यह बीटीसी में मेरिट वाला सिस्टम चला तब से सन्नी जैसे लड़कों की लॉटरी निकल गई। किसी को क्या मालूम की वह इतने नंबर कैसे लाया। बस उसकी मेरिट हाई है तो उसका नंबर बीटीसी में आ गया और वो आज एक बीटीसी टीचर है। नौकरी लगते ही लड़की वाले टूटकर पड़े कि कहीं लड़का हाथ से ना निकल जाए। यानि सेटिंग के फंडे ने लाइफ सेट कर दी। दूसरी तरफ अशोक है जो शुरू से ही सरकारी स्कूल में पढ़ा। मेहनत के साथ नंबर लाया लेकिन उसके नंबर सेटिंग वाले नंबरों कम ही रहे। गरीब का बच्चा था, और सेटिंग नहीं कर सकता था क्योंकि सेटिंग के लिए पैसों की जरूरत पड़ती है और वैसे भी वो शुरू से ही मेहनती लड़का था और सेटिंग से ज्यादा मेहनत की पढ़ाई पर विश्वास करता था। दिन रात मेहनत से पढ़ता था लेकिन मेहनत की पढ़ाई करके सेटिंग की पढ़ाई से पीछे ही रहा। जिसका खामियाजा उसे आज झेलना पड़ रहा है। उसका बीटीसी में चयन नहीं हुआ और अच्छी तरह पढ़ाई करने के बाद और ज्यादा योग्य होने के बाद भी आज वो आज रेलवे फाटक के पास खड़ा होकर नींबू बेचता है। अगर उसके पास भी पैसे होते और वो भी सन्नी की तरह सेटिंग सेट करता तो शायद उसका नंबर भी बीटीसी जैसी किसी नौकरी में आ जाता।
कहानी का सारांश ये है कि उत्तर प्रदेश में जिस तरह पहले बीएड किए हुए सभी बच्चों को मेरिट के आधार पर सीधे ही विशिष्ट बीटीसी में चयनित कर लिया गया और फिर अब ग्रेजुएट बच्चों को सीधे बीटीसी में चयन किया जा रहा है क्या वो किसी हद तक सही है। अशोक जैसे ना जाने कितने ही लड़के और लड़कियां योग्यता होने के बावजूद दर दर की ठोकरें खा रहे हैं और सन्नी जैसे लड़के सिस्टम की इस घटिया नीति के चलते आज मास्टर जी बने बैठे हैं। जिन्हें ये तक नहीं पता कि देश का राष्ट्रपति कौन है। सीधी सी बात है कि जो आज तक खुद ही स्कूल नहीं गया वो छोटे छोटे बच्चों को क्या पढ़ाएगा। इस तरह से तो उत्तर प्रदेश सरकार सिर्फ पढ़े लिखे अनपढ़ मास्टरों की एक फौज तैयार कर रही है। इस सिस्टम से उन योग्य बच्चों की तो जिंदगी खराब हो ही रही है जिनका नंबर इस मेरिट के वजह से बीटीसी में नहीं आ पाया, साथ ही उन छोटे छोटे बच्चों का भी भविष्य भी अंधेरे में जा रहा है जो ऐसे मास्टरों से शिक्षा ग्रहण करेंगे। यही वजह है कि भारत सरकार जिस तरह देश में जीतोड़ करने सर्वशिक्षा अभियान चला रही है उसे उस तरह के सकारात्मक परिणाम नहीं मिल रहे हैं। इस मेरिट सिस्टम ने उन लोगों को भी मास्टर बना दिया जिनका मास्टरी में रूझान नहीं था लेकिन सरकारी नौकरी के लालच में वो इसे छोड़ नहीं पाए। किसे अच्छा नहीं लगता है कि दिन में सिर्फ पांच छह घंटे कुर्सी तोड़ कर महिने में सौलह सत्तरह हजार रूपए सीधे कर लें। यही कारण है कि वे बच्चों को दिल से नहीं पढ़ा रहे हैं जिसके कारण इस योजना पर फूंका जा रहा करोड़ो अरबों रूपया पानी में जा रहा है।
क्या इसकी जगह इसमें परीक्षा का प्रावधान नहीं होना चाहिए था। अगर यूपी सरकार बीटीसी अध्यापकों की नियुक्ति के लिए परीक्षा वाली नियुक्ति प्रक्रिया अपनाती तो इसके बहुत फायदे होते। एक तो वही लोग इस परीक्षा में पास होकर अध्यापक बनते जो वास्तव में ही अध्यापक बनने की योग्यता रखते हैं और दूसरे वे लोग इस क्षेत्र में नहीं आते जो इस प्रोफेशन में नहीं आना चाहते थे। अगर यह प्रक्रिया बीटीसी के चयन में अपनाई जाती तो शायद तब जाकर इस योजना का पूरा पूरा फायदा मिल पाता। और साथ ही उन छोटे छोटे बच्चों को भी कुछ ना कुछ सीखने को मिल जाता जो लगभग सवा लाख अध्यापक नियुक्त होने के बाद भी शिक्षा के लिए तरस रहे हैं। सरकार को अपनी इस नीति पर एक बार विचार जरूर करना चाहिए।
Monday, June 28, 2010
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