Wednesday, January 13, 2010
जानलेवा अपेक्षाएं।
मुंबई में एक ही दिन चार बच्चों के आत्महत्या और बुधवार को दिल्ली में एक छात्रा द्वारा आत्महत्या। ऐसा लगता है कि छात्र- छात्राओं द्बारा आत्महत्या का एक चलन चल पड़ा है। और इस चलन के पीछे सबसे बड़ी भूमिका है माता पिता की। माता पिता की अपेक्षाओं पर खरा ना उतर पाने के कारण ही बच्चे छोटी छोटी उम्र में मौत को गले लगा रहे हैं। उस उम्र में, जिसमें उन्हें मौत का सही सही मतलब भी नहीं पता है। 12 वर्ष का सुशांत पाटिल अच्छे नंबर नहीं ला पाया तो फांसी से झूल गया, 11 वर्ष की नेहा के माता पिता ने चाहा कि वह डांस छोड़कर स्कूल की पढ़ाई पर ध्यान दे तो उसने जहर खा लिया। आखिर ये माता पिता अपने बच्चों से इतनी अपेक्षाएं रखते ही क्यों हैं जो उनके लिए जानलेवा बन जाती है। जिनके पूरे ना होने से बच्चा इतनी ग्लानी महसूस करता है कि जिंदगी छोड़ने की ही मन बना लेता है। क्या कभी इन्होंने बच्चे से पूछा कि वह क्या बनना चाहते है, उसकी क्या आकांक्षाएं हैं। शायद नहीं। क्योंकि आज का मानव विकास की दौड़ में इतना अंधा हो चुका है कि उसकी भावनाएं मर चुकी हैं। वह अपने बच्चों पर सफलता और कामयाबी शब्द को सिर्फ चस्पा कर देना चाहता है बिना यह सोचे कि वह बच्चे को किस दिशा में ले जा सकता है। हालिया प्रदर्शित फिल्म थ्री इडियट्स भी इसी व्यवस्था पर चोट करने वाली फिल्म है। उसके भी एक किरदार को उसके माता पिता पैदा होते ही भविष्य तय कर देते हैं कि हमारा बेटा इंजीनियर बनेगा। आखिर क्या फायदा ऐसी सफलता का जिसमें हमारे बच्चे दम घोंट घोंट कर जिएं। इससे तो अच्छा है कि एक बार उनसे भी पूछ लिया जाए कि वे क्या बनना चाहते हैं।
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